जवाहरलाल नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला के बीच कश्मीर मसले पर समझौता हुआ था. जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीरियों के सामने
संकल्प लिया था कि कश्मीरी ही कश्मीर का भविष्य निर्धारित करेंगे.
रेफ़रेंडम
के उस ज़िक्र को कई राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टियां भारत की एक कूटनीतिक
भूल भी मानते हैं. शेख़ अब्दुल्ला ने ख़ुशी के इस मौक़े पर फ़ारसी में एक
नज़्म पढ़ी थी जिसका अर्थ, "मैं आप बन गया और आप मैं बन गए. मैं आपका शरीर
बन गया और आप मेरी आत्मा बन गए. अब कोई कह नहीं सकता कि हम अलग-अलग हैं."1947 के बाद से कश्मीर के हालात लगातार बिगड़ते गए. चरमपंथ और वामपंथ का अड्डा बनते कश्मीर के लाल चौक को रूस के रेड स्क्वेयर की तरह देखा जाने लगा. लाल चौक धीरे-धीरे भारत के ख़िलाफ़ होने वाली हर गतिविधि के केंद्र बन गया. लाल चौक पर ख़ून से सनी कई इबारतें लिखी गईं.
भारत से विद्रोह और पाकिस्तान की हिमायत, इन दोनों की क़वायद करने वाले नेताओं ने लाल चौक पर ख़ूब झंडे फहराए. आज हमें यह सोचना है कि कश्मीर का लाल चौक क्या वास्तव में किसी प्रतीकात्मक विजयघोष का केंद्र है?
अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने पर लाल चौक का वामपंथी मिथक भरभरा कर गिर चुका है. एक सुदूर, अप्राप्य और बौद्धिक रोमांच के दिवास्वप्न का प्रतीक लाल चौक क्या आज के भारत और कश्मीर का प्रतिनिधित्व करता है?
1990 में कश्मीरियत को मिले सांप्रदायिक धोखे और पंडितों के जबरन पलायन का मूकदर्शक लाल चौक नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला के मौखिक संकल्प पर कभी न खुलने वाले सांप्रदायिक साँकल की तरह है.
कश्मीरियत के नाम पर की जाने वाली दोयम दर्जे की राजनीति का केंद्र बन चुका लाल चौक आज के संदर्भ में नकारात्मकता का केंद्र है.
चाहे वह 2008, 2009 या 2010 का भारत विरोधी प्रचार हो, या वह कर्फ़्यू लगे कश्मीर में पैसे लेकर पत्थर फेंकने वाले युवाओं का जत्था हो, लाल चौक कश्मीर की बर्बादी का प्रतीक है.
पिछले कई दशकों की भारत विरोधी और कश्मीरी विरोधी राजनीतिक स्ट्रैटेजी और उसके प्रयोगों की परखनली है लाल चौक.
लेकिन अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी के साथ कश्मीर के साथ भारत के संवैधानिक एकीकरण के बाद लाल चौक इस देश के किसी अन्य चौक की तरह बन गया है.
हालाँकि कालांतर में कश्मीर में हुए सांप्रदायिक इस्लामिक चरमपंथ ने नेहरु के संकल्प की अवमानना करते हुए लाल चौक की स्मृतियों को दूषित किया तो था लेकिन अनुच्छेद 370 का निष्प्रभावी होना, लाल चौक की प्रतीकात्मक राजनीति को पूरी तरह से ध्वस्त करता है.
जैसे त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को गिराकर त्रिपुरावासियों ने जर्जर हो चुकी एक विचार परम्परा का बहिष्कार किया, ठीक उसी तरह, कश्मीर में लाल चौक को किसी भी ऐतिहासिकता से वंचित कर देना एक वैचारिक क़दम होगा.
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